हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, मौलाना अबुलक़ासिम काशानी नजफ़ी 1275 हिजरी में सरज़मीने नजफ़ अशरफ़ पर पैदा हुए। आप के वालिद आक़ाए शेख अब्दुल हकीम काशानी और आप के आबा व अजदाद भी इल्म व दीन के अलमबरदार थे और मौसूफ़ ने इसी इल्मी व मज़हबी माहौल में परवरिश पाई।
मौलाना अबुल क़ासिम काशानी ने तालीम व तरबियत का आग़ाज़ नजफ़े अशरफ़ में किया और 14 साल तक वहीं तहसील-ए-इल्म में मशग़ूल रहे। इसी दौरान आपने इल्म-ए-नह्व, मंतिक़, मआनी, बयान, बदीअ, रेजाल, दरायत, अख़लाक़ और फ़िक़्ह व उसूल में महारत हासिल की। तफ़सीर और हदीस में आप की मालूमात वसी थी और मौसूफ़ को सैंकड़ों रिवायतें हिफ़्ज़ थीं। अरबी ज़बान में मौलाना की महारत ऐसी थी कि सुनने वाला आप को अरब समझता था हालाँकि मौसूफ़ अरब नहीं थे। मौलाना अबुल क़ासिम काशानी तजवीद व क़िराअत में भी माहिर थे। ख़ुतबात इतने मोअस्सिर होते कि सामेइन को रोनें पर मजबूर कर देते। मौलाना को हिसाब, हैअत, हिन्दसा, इस्तरलाब और इल्म-ए-नजूम पर भी दस्तरस थी। मौसूफ़ को क़ुरआन मजीद के बाईस पारों और अरबी अदब के दो हज़ार से ज़्यादा अशआर हिफ़्ज़ थे।
नजफ़ में क़याम के दौरान मौलाना ने फ़िक़्ह व उसूल के दरूस में महारत हासिल की और वहाँ के बुज़ुर्ग उलमा के दर्स-ए-ख़ारिज में शरीक हुए। आप के नुमायां असातिज़ा में: आयतुल्लाह मिर्ज़ा अब्दुल्लाह, आयतुल्लाह शेख अब्दुल्लाह किर्मानी, आयतुल्लाह मिर्ज़ा मुहम्मद अली रश्ती मुजतहिद, आयतुल्लाह अब्दुर्रहीम शूश्तरी, आयतुल्लाह आख़ुंद मुल्ला मुहम्मद काज़िम ख़ुरासानी, आयतुल्लाह मिर्ज़ा हुसैन और आयतुल्लाह शेख मुहम्मद हसन “साहिब ज़राए-ए-उल एलाम” के अस्माए गिरामी सर-ए-फ़ेहरिस्त हैं।
मौलाना अबुल क़ासिम 1307 हिजरी में तबलीग़-ए-दीन की ग़र्ज़ से हिंदुस्तान तशरीफ़ लाए और मुंबई को अपना मरकज़ बनाया। आपने मुख़्तलिफ़ मक़ामात पर तबलीगी फ़राइज़ अंजाम दिए और 1314 हिजरी में महुवा में इमामे जुमा व जमाअत जैसे फ़रीज़े को अंजाम दिया। मुंबई में मौसूफ़ ने बहुत से हज़रात को मोअस्सिर अंदाज़ में दीन की तरफ़ राग़िब किया तो वो भी आप की इक़्तिदा में नमाज़ पढ़ने लगे। क़हतुर्रिजाल के उस दौर में नमाज़े जुमा में तक़रीबन दो सौ अफ़राद शरीक होते। आपने महसू़स किया कि एक मुस्तक़िल शिया इसना अशरी मस्जिद की ज़रूरत है।
मौलाना अबुलक़ासिम काशानी ने शिया ख़ोजा जामे मस्जिद और आराम बाग़ की तामीर के लिए काम शुरू किया। इबतिदाई तौर पर आपने आराम बाग़ के नाम से क़ब्रिस्तान क़ायम किया और फिर मस्जिद की तामीर का आग़ाज़ किया। 1317 हिजरी में ख़ोजा शिया जामे मस्जिद की बुनियाद रखी गई लेकिन लोगों ने मुख़ालेफ़त की और काम रोकने की कोशिश की। हालांकि आप और आप के साथियों ने शबाना रोज़ मेहनत की और हुकूमत की मदद से मस्जिद की तामीर मुकम्मल हुई और माहे ज़िलहिज्जा 1320 हिजरी में मस्जिद बन कर तैयार हो गई।
मौलाना को इस सिलसिले में शदीद मुश्किलात, मुख़ालेफ़त और अज़ीयतों का सामना रहा, मगर आप साबित क़दम रहे और तबलीगी ख़िदमात जारी रखीं। मुंबई में आप पहले ईरानी शिया थे, इस के बाद शिया ख़ोजा जमाअत वजूद में आई और तरक़्क़ी करती गई। आपने अपना नायब जनाब आगा सैय्यद हुसैन को मुक़र्रर किया जो आप की ग़ैर मौजूदगी में वाज़ और नमाज़ के फ़राइज़ अंजाम देते। यूं मुसलसल चालीस साल आपने मुंबई में ख़िदमत-ए-दीन अंजाम दी।
तद्रीस के शोबे में भी आपने नुमायां किरदार अदा किया। मौलाना ने नजफ़ के क़याम के दौरान फ़िक़्ह, उसूल, हदीस और तफ़्सीर की तालीम दे कर बहुत से औलमा-ए-किराम की तरबियत की। आप के शागिर्दों में मौलाना शेख अबुलक़ासिम, मौलाना शेख अब्दुल्लाह, आगा-ए-शेख अहमद काशिफ़ुल-ग़िता, आक़ा-ए-हाज अहमद आगा शामिल हैं। मुंबई में आप के शागिर्दों में हाजी मुल्ला मुहम्मद बाक़िर फैज़ाबादी, मौलवी अली मोहम्मद, मौलाना फ़िदा हुसैन के अस्माए गिरामी क़ाबिले ज़िक्र हैं।
आपने तसनीफ़ व तालीफ़ में भी नुमायां ख़िदमात अंजाम दीं, जिन में “इमादुल ईमान बाबुस्सलात अमलिया, “रौज़तुल अह़रार शफ़ाअतुल अत़्फ़ालिस्सिग़ार, “मज्मअुल लताइफ़ व ज़राफ़ - इस्मतुल अह़रार दर तज़किरा कबाइर, “शरहे जवाबे इमाम रिज़ा दर आयते मुबाहेला, “शरह मतीन अरबी”, मंज़ूमाते शेख, “हदीसे क़िसा नज़मे फ़ारसी, “रिसाला ए तौहीद व अरबी नज़्म और मजमूआ ख़ुतूत व मुरासेलात के नाम लिए जा सकते हैं।
मौलाना अबुल क़ासिम काशानी आलिम, फाज़िल, फ़क़ीह, मुजतहिद, मुहद्दिस, मुहक़्क़िक़, निहायत मुक़द्दस, मुनक़सिरुल मज़ाज और ख़ुशख़त व ख़ुशकलाम थे। 1311 हिजरी और 1313 हिजरी में हज-ए-बैतुल्लाह की सआदत हासिल की और एक मर्तबा ज़ियारात-ए-मक़ामात-ए-मुक़द्दसा से भी मशर्रफ़ हुए। 1331 हिजरी में बीमारी के बाइस अपने साहिबज़ादे को नजफ़ से बुलाया और मुंबई में अपनी जगह मुक़र्रर किया और ख़ुद इबादात व रियाज़त में मशग़ूल हो गए।
1338 हिजरी में ज़ियारत-ए-अत्बात आलियात के लिए तशरीफ़ ले गए और उलमा-ए-इस्लाम से मुलाक़ात की। यह सफ़र तक़रीबन एक साल जारी रहा। 1339 हिजरी में वतन वापस तशरीफ़ लाए।
ख़ुदावंदे आलम ने आप को छह फ़र्ज़ंद अत़ा किए जिन में एक फ़र्ज़ंद-ए-सालेह मौलाना शेख मोहम्मद हसन नजफ़ी क़ाबिले ज़िक्र हैं।
एक दिन आपने अपने फ़र्ज़ंद को अपने पास बुलाया और फ़रमाया कि अब हमारी ज़िंदगी के दिन खत्म होने वाले हैं, इसलिए हमें इराक़ भेज दो। मौलाना के कहने पर आप के साहिबज़ादे ने आप को इराक़ रवाना किया। मौसूफ़ कर्बला और कुछ अरसा नजफ़ में सुकूनतपज़ीर हो गए।
आख़िरकार यह इल्म व अदब का चमकता आफ़ताब 28 सफ़रुल मुज़फ़्फ़र 1350 हिजरी बुरोज़ चहार शमबे ग़ुरूब हो गया। तशीय-ए-जनाज़ा में मोमिनीन व उलमा की बड़ी तादाद ने शिरकत की। नमाज़े जनाज़ा के बाद आप को अल्लामा बहबहानी के क़रीब रवाक़े सैय्यदुश्शुहदा अ: कर्बला में सुपुर्दे ख़ाक कर दिया गया।
माखूज़ अज़: मौलाना सैयद रज़ी ज़ैदी फंदेड़वी जिल्द-10 पेज-296 दानिशनामा ए इस्लाम इंटरनेशनल नूर माइक्रो फ़िल्म सेंटर, दिल्ली, 2024ईस्वी।
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